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इस्लाम में मूर्ति पूजा का खंडन

इस्लामी स्रोतों में "मूर्ति पूजा" को कुफ्र (इस्लाम का इनकार) तथा शिर्क (बहुदेववाद) कहते हैं ।

इस्लामी धर्मग्रंथों में मूर्ति पूजा करने वाले को काफिर (जो अल्लाह को इनकार करता है) और मशरिक़ (बहुदेववादी) कहा जाता है।

कुरान मूर्ति पूजा को मना करता है। कुफ्र और शिर्क के 500 से अधिक उल्लेख कुरान में पाए जाते हैं, और दोनों अवधारणाएं निषिद्ध हैं।

मूर्ति पूजा की इस्लामिक अवधारणा बहुदेववाद से परे फैली हुई है, और इसमें कुछ ईसाई और यहूदी भी शामिल हैं, उदाहरण के लिए:

"जो लोग उसके क़ायल हैं कि मरियम के बेटे ईसा मसीह ख़ुदा हैं वह सब काफ़िर हैं हालॉकि मसीह ने ख़ुद यूं कह दिया था कि ऐ बनी इसराईल सिर्फ उसी ख़ुदा की इबादत करो जो हमारा और तुम्हारा पालने वाला है क्योंकि (याद रखो) जिसने ख़ुदा का शरीक बनाया उस पर ख़ुदा ने बेहिश्त को हराम कर दिया है और उसका ठिकाना जहन्नुम है और ज़ालिमों का कोई मददगार नहीं"
- कुरान 5.72
बुतपरस्ती से अभिप्राय : मूर्तियों की पूजा करना और उनसे लगाव रखना है। यह शब्द उन स्थलीय (लौकिक) धर्मों को इंगित करता है, जो मूर्तियों की पूजा करते हैं, जैसे कि अरब, भारत, जापान इत्यादि के अनेकेश्वरवादी, जबकि अह्ले किताब यानी यहूदियों और ईसाइयों का मामला इसके विपरीत है।

कुरआन और सुन्नत : में मूर्तियों की पूजा करने से निषेध किया गया है, और अकेले अल्लाह की पूजा करने का आदेश दिया गया है।

अल्लाह तआला ने फरमाया :

فَاجْتَنِبُوا الرِّجْسَ مِنَ الْأَوْثَانِ وَاجْتَنِبُوا قَوْلَ الزُّورِ
الحج/30
“तो तुम मूर्तियों की गन्दगी से बचो और झूठी बात से (भी) बचो।” (सूरतुल हज्जः 30)
तथा सर्वशक्तिमान (अल्लाह) ने फरमाया :
وَالرُّجْزَ فَاهْجُرْ
المدثر/5
“और अर-रुज्ज़ (मूर्तियों) से दूर रहो!” (सूरतुल मुद्दस्सिरः 5).
अबू सलमह ने कहा : “अर-रुज्ज़” से अभिप्राय मूर्तियाँ हैं। इसे बुखारी ने अपनी सहीह में किताबुत-तफसीर, अल्लाह के कथनः ‘वर्रुज्ज़ा फह्जुर’ के अध्याय के अंतर्गत, मुअल्लक़न रिवायत किया है।

तथा अल्लाह तआला ने फरमाया :

وَإِبْرَاهِيمَ إِذْ قَالَ لِقَوْمِهِ اعْبُدُوا اللَّهَ وَاتَّقُوهُ ذَلِكُمْ خَيْرٌ لَكُمْ إِنْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَ (16) إِنَّمَا تَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ أَوْثَانًا وَتَخْلُقُونَ إِفْكًا إِنَّ الَّذِينَ تَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ لَا يَمْلِكُونَ لَكُمْ رِزْقًا فَابْتَغُوا عِنْدَ اللَّهِ الرِّزْقَ وَاعْبُدُوهُ وَاشْكُرُوا لَهُ إِلَيْهِ تُرْجَعُونَ 
العنكبوت/16، 17
“और याद करो इबराहीम को जब उन्होंने अपनी क़ौम के लोगों से कहाः अल्लाह की उपासना करो और उससे डरते रहो। यही तुम्हारे लिए बेहतर है, यदि तुम जानते हो। तुम तो अल्लाह को छोड़कर मात्र मूर्तियों को पूज रहे हो और झूठ घड़ रहे हो। निःसंदेह तुम अल्लाह को छोड़कर जिनको पूजते हो वे तुम्हारे लिए रोज़ी का भी अधिकार नहीं रखते। अतः तुम अल्लाह ही के यहाँ रोज़ी तलाश करो और उसी की इबादत करो और उसके आभारी बनो। तुम्हें उसी की ओर लौटकर जाना है।” (सूरतुल अनकबूतः 16 -17).
तथा उसने फरमाया :
وَقَالَ إِنَّمَا اتَّخَذْتُمْ مِنْ دُونِ اللَّهِ أَوْثَانًا مَوَدَّةَ بَيْنِكُمْ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ثُمَّ يَوْمَ الْقِيَامَةِ يَكْفُرُ بَعْضُكُمْ بِبَعْضٍ وَيَلْعَنُ بَعْضُكُمْ بَعْضًا وَمَأْوَاكُمُ النَّارُ وَمَا لَكُمْ مِنْ نَاصِرِينَ
العنكبوت/26
“और उसने कहा कि तुमने अल्लाह को छोड़कर जिन मूर्तियों को (पूज्य) बना रखा है वह केवल सांसारिक जीवन में तुम्हारी पारस्परिक दोस्ती के कारण है। फिर क़ियामत के दिन तुममें से (हर) एक, दूसरे (की दोस्ती) का इनकार करेगा और तुममें से (हर) एक, दूसरे पर लानत (धिक्कार) करेगा। और तुम्हारा ठिकाना आग होगा और कोई तुम्हारा सहायक न होगा।” (सूरतुल अनकबूतः 26).
तथा बुखारी (हदीस संख्या : 7) ने अबू सुफयान के साथ हिरक़्ल की कहानी के विषय में रिवायत किया है कि हिरक़्ल ने कहाः “और मैंने तुमसे पूछा कि वह तुमसे किस चीज़ के लिए कहते हैं, तो तुमने कहा कि वह तुम्हें हुक्म देते हैं कि तुम अल्लाह की इबादत करो और उसके साथ किसी भी चीज़ को साझी न ठहराओ, और वह तुम्हें मूर्तियों की पूजा से रोकते हैं। तथा वह तुम्हें नमाज़ पढ़ने, सच्च बोलने और सतीत्व की रक्षा करने का हुक्म देते हैं। अतः यदि ये बातें जो तुम कह रहे हो, सच्च हैं तो निकट ही वह इस स्थान का मालिक हो जाएगा जहाँ मेरे ये दोनों पाँव हैं।”

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